
सूखी धरती ,हरी कोंपल /
सुधा भार्गव
उस रात की काली स्याही सी गहराती
चादर ….!वह बच्चे को पालने में झुला रही थी । उसके माथे पर चिंता
की गहरी लकीरें उभर आईं। फुसफुसाते बोली , "मैंने आज फिर वही सपना देखा... वह आभा... वह काँच का पिंजरा... क्या
यही हमारा सच है?" उसकी आवाज़ में एक अनकहा भय ।
"हाँ, छवि ,यह सिर्फ सच नहीं, बल्कि हमारी जीत भी है।"अर्जुन
की आवाज में एक गहरा सुकून!
"लेकिन... जब हमारा बच्चा जानेगा कि
उसको जन्म देने वाली मां कोई और है तब क्या वह हमारी ममता की गरमाहट महसूस कर पाएगा? “उसकी आवाज़ में एक टीस थी।
"तुम तो नाहक चिंता कर रही हो। आभा
कोई हाड़ -मांस वाली माँ नहीं, वह तो
बस एक कृत्रिम
गर्भाशय था …
हमारे बच्चे को इस दुनिया में लाने के लिए एक सुरक्षित आश्रय । उसको शीशे से ढका
गया था ताकि नवजीवन के हर स्पंदन को आंखों से
देखा जा सकें।”
"क्या मेरी कोख सुरक्षित नहीं थी उसके
लिए?" एक दर्द भरा सवाल।
"नहीं... इसीलिए तो हम दो बार अपने
बच्चे को इस दुनिया में आने से पहले ही खो चुके हैं।" अर्जुन की आवाज़ में दुख था, पर
चट्टान सी दृढ़ता । "तुम्हारे
चेहरे पर जो उदासी है, वह तुम्हारी ही नहीं, बल्कि
इस पूरी धरती की व्यथा है। हवा में घुलते विष ने जीवन की हर कोंपल को जलाकर राख कर दिया है। सूने आँगन, सूनी गोदें... और एक खामोश हाहाकार चारों ओर पसरा
हुआ है। ज़हरीली हवा की वजह से भ्रूण सही से विकसित नहीं हो पा रहे हैं।“
"तो...
वह सच्ची की कोख नहीं थी जहाँ मेरा लाडला पैदा
हुआ? तो फिर वह पनप कैसे गया?"उसकी आँखों में हैरानी के बुलबुले!
अर्जुन ने प्यार से उसके माथे पर हाथ
फेरा। "उस कृत्रिम कोख के अंदर का वातावरण
और पोषक तत्व --- सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था, जैसा एक माँ के गर्भ में होता है। तभी तो तुम्हें इतना गोल-मटोल और
प्यारा बेटा नसीब हुआ है।"
"कोख... नकली---!पर आभा!! आभा भी नकली
माँ! मतलब रोबोट माँ…!"उसकी
आंखें चमकने लगी । इस चमक में समझ और
प्रेम का उजाला था------तो हमारा बच्चा हमारे शरीर से नहीं, हमारी इच्छा, हमारे प्यार और हमारी आशा से पैदा हुआ है!"
“हाँ —और हमने उसे आत्मा और पहचान भी
दी है। उसकी परवरिश हम माँ-बाप के प्यार से ही हो रही है।"
छवि ने अपने बच्चे की तरफ देखा,
जिसमें उसे अपनी ही छवि नजर आ रही थी।उसे लगा मानो उसका प्यार
उस सूनी रात में, संगीत
बनकर गूँज रहा है।
सितंबर 2025
2--आखिरी ईंट
सुधा भार्गव
छवि का अतीत एक शीत हिमखंड था,
जहाँ ममता की छाया का सूर्यताप कभी नहीं पहुँचा।
उसका जीवन निर्जन वन बन चुका था, जिसमें
स्नेह की नदी सूख गई । इसी सूनेपन को भरने के लिए, उसने अपनी चेतना को भी यंत्रों की नीरसता में ढाल दिया ।
उसने अपनी पीड़ा को एक भौतिक आकार
देने की ठानी। मानवाकार रोबोट को जन्म देकर ही उसने
चैन की सांस ली। जो उसकी मां की बहुत कुछ हमशक्ल थी। उसे नाम दिया—अंजलि माँ।
छवि ने अपनी स्मृतियों के अंश—अपनी माँ की आदतें, उनके बोलने का लहजा—सबको मानवाकार प्रोग्राम में फूँक दिया। उस धातु
की प्रतिमूर्ति में कृत्रिम वात्सल्य का संचार हुआ। अंजलि जब उसे बेटी कहकर
पुकारती तो उसकी आवाज में माँ की गूंज सुनाई देती।वह अपनी कृति पर ही मोहित हो उठी
।
छवि का उजड़ा मन पहली बार आशा के प्रकाश से जगमगा उठा। उसे लगा, नियति ने पहली वंचना का मूल्य चुका दिया है।
अचानक एक घातक क्षण आया जब अंजलि माँ
के भीतर का संसार ढह गया। उसकी समस्त संवेदनाएँ—जो केवल कोड थीं— तिरोहित हो गईं।
वह आकृति अब मात्र एक शीतल धातुकूट बनकर रह गई; निर्जीव, भावहीन, केवल आज्ञा का यांत्रिक पालन करती हुई। वात्सल्य का स्वर अब एक
गूँजहीन रोबोटिक ध्वनि में बदल गया ।
वह चौंक पड़ी -”अरे तो क्या मैं अब तक मिथ्य जगत में जी रही थी
!एक पल का भी विलंब किए बिना उसने
रोबोट के हृदय पर लगी प्रोग्रामिंग चिप को मुट्ठी में बंद कर जोर से भींच लिया …मानो
वह चिप न होकर ममता की खंडित धरोहर हो।
सितंबर 2025





