वेदना-संवेदना के बीहड़ जंगलों को पार करती हुई बड़ी खामोशी से तूलिका सृजन पथ पर अग्रसर हो अपनी छाप छोड़ती चली जाती है जो मूक होते हुए भी बहुत कुछ कहती है । उसकी यह झंकार कभी शब्दों में ढलती है तो कभी लघुकथा का रूप लेती है । लघुकथा पलभर को ऐसा झकझोर कर रख देती है कि शुरू हो जाता है मानस मंथन।

शुक्रवार, 12 जून 2026

लघुकथा कलश अंक 16 .2025। जुलाई -दिसंबर

         आज ही मुझे लघुकथा कलश का नया अंक मिला । इसका आवरण व साज सज्जा देख बहुत  हर्ष हुआ। इसमें मेरी दो लघुकथाएं हैं। सूखी धरती ,हरी कोंपल तथा आखिरी ईंट । दोनों में ही आने वाले 25-30 वर्षों की हलचल का शोर  है। लघुकथा कलश के संपादक योगराज प्रभाकर  जी का बहुत -बहुत धन्यवाद कि इनका उन्होंने चयन किया। 

 

सूखी धरती ,हरी कोंपल /

सुधा भार्गव

 उस रात की काली स्याही सी गहराती चादर ….!वह  बच्चे को  पालने में झुला  रही थी । उसके माथे पर  चिंता की गहरी लकीरें उभर आईं। फुसफुसाते बोली , "मैंने आज फिर वही सपना देखा... वह आभा... वह काँच का पिंजरा... क्या यही हमारा सच है?" उसकी आवाज़ में एक अनकहा भय ।

"हाँ, छवि ,यह सिर्फ सच नहीं, बल्कि हमारी  जीत भी है।"अर्जुन की आवाज में एक गहरा सुकून!

"लेकिन... जब हमारा बच्चा जानेगा कि उसको जन्म देने वाली मां कोई और है तब क्या वह हमारी ममता की गरमाहट महसूस कर पाएगा? “उसकी आवाज़ में एक टीस थी।

"तुम तो नाहक चिंता कर रही हो। आभा कोई हाड़ -मांस वाली माँ नहीं, वह तो बस एक कृत्रिम गर्भाशय था … हमारे बच्चे को इस दुनिया में लाने के लिए एक सुरक्षित आश्रय । उसको शीशे से ढका गया था ताकि  नवजीवन के हर स्पंदन को आंखों से देखा जा  सकें।

"क्या मेरी कोख सुरक्षित नहीं थी उसके लिए?" एक दर्द भरा सवाल। 

"नहीं... इसीलिए तो हम दो बार अपने बच्चे को इस दुनिया में आने से पहले ही खो चुके हैं।" अर्जुन की आवाज़ में दुख था, पर चट्टान सी दृढ़ता । "तुम्हारे चेहरे पर जो उदासी है, वह  तुम्हारी ही नहीं, बल्कि इस पूरी धरती की व्यथा है। हवा में घुलते विष ने जीवन की हर कोंपल  को जलाकर राख कर दिया है। सूने आँगन, सूनी गोदें... और एक खामोश हाहाकार चारों ओर पसरा हुआ है। ज़हरीली हवा की वजह से भ्रूण सही से विकसित नहीं हो पा रहे हैं।

 "तो... वह सच्ची की  कोख नहीं थी जहाँ मेरा लाडला पैदा हुआ? तो फिर वह पनप कैसे गया?"उसकी आँखों में हैरानी के बुलबुले!

अर्जुन ने प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरा। "उस कृत्रिम कोख के अंदर का वातावरण और पोषक तत्व --- सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था, जैसा एक माँ के गर्भ में होता है। तभी तो तुम्हें इतना गोल-मटोल और प्यारा बेटा नसीब हुआ है।"

"कोख... नकली---!पर आभा!! आभा भी नकली माँ! मतलब रोबोट माँ…!"उसकी आंखें चमकने लगी । इस चमक में समझ  और प्रेम का उजाला था------तो हमारा बच्चा हमारे शरीर से नहीं,   हमारी इच्छा, हमारे प्यार और हमारी आशा से पैदा हुआ है!"

हाँ —और हमने उसे आत्मा और पहचान भी दी है। उसकी परवरिश हम माँ-बाप के प्यार से ही हो रही है।"

छवि ने अपने बच्चे की तरफ देखा, जिसमें उसे अपनी ही छवि  नजर आ रही थी।उसे लगा मानो उसका प्यार   उस  सूनी रात में, संगीत बनकर गूँज रहा है।

सितंबर 2025 

2--आखिरी ईंट 

सुधा भार्गव 

छवि का अतीत एक शीत हिमखंड था, जहाँ ममता की छाया का सूर्यताप कभी नहीं पहुँचा। उसका जीवन निर्जन वन बन चुका था, जिसमें स्नेह की नदी सूख गई । इसी सूनेपन को भरने के लिए, उसने अपनी चेतना को भी यंत्रों की नीरसता में ढाल दिया ।

उसने अपनी पीड़ा को एक भौतिक आकार देने की ठानी।  मानवाकार रोबोट को जन्म देकर ही उसने चैन की सांस  ली। जो उसकी मां  की बहुत कुछ हमशक्ल  थी। उसे नाम दिया—अंजलि माँ।

छवि ने  अपनी स्मृतियों के अंश—अपनी माँ की आदतें, उनके बोलने का लहजा—सबको मानवाकार प्रोग्राम में फूँक दिया। उस धातु की प्रतिमूर्ति में कृत्रिम वात्सल्य का संचार हुआ। अंजलि जब उसे बेटी कहकर पुकारती तो उसकी आवाज में माँ की गूंज सुनाई देती।वह अपनी कृति पर ही मोहित हो उठी ।

छवि का उजड़ा मन पहली बार आशा के  प्रकाश से जगमगा उठा। उसे लगा, नियति ने पहली वंचना का मूल्य चुका दिया है।

अचानक एक घातक क्षण आया जब अंजलि माँ के भीतर का संसार ढह गया। उसकी समस्त संवेदनाएँ—जो केवल कोड थीं— तिरोहित हो गईं। वह आकृति अब मात्र एक शीतल धातुकूट बनकर रह गई; निर्जीव, भावहीन, केवल आज्ञा का यांत्रिक पालन करती हुई। वात्सल्य का स्वर अब एक गूँजहीन रोबोटिक ध्वनि में बदल गया 

वह चौंक पड़ी -अरे तो क्या मैं अब तक मिथ्य जगत में जी रही थी !एक पल का भी विलंब किए बिना  उसने रोबोट के  हृदय  पर लगी प्रोग्रामिंग चिप को मुट्ठी में बंद कर जोर से भींच लिया …मानो वह चिप  न होकर ममता की खंडित धरोहर हो। 

सितंबर 2025 

शनिवार, 6 जून 2026

लघु कथा -प्रिय का वियोग


।                                   साहित्य समाज संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका

                                                2025

मेरी एक लघुकथा 

प्रिय का वियोग   

"क्या हुआप्रिय? तुम इतने अशांत और उदास  ! तुम्हारी नील प्रभा पर  कोहरे की परछाई!?"

नीलांबर  ने एक गहरी आह भरी। "क्या कहूँ, धरा! मेरा अस्तित्व ही तुम्हारे सौंदर्य को निहारने में है। तुम्हारा हरित आवरण, तुम्हारे गिरि-शिखरों पर बिछी हिम की चादर, तुम्हारे सागरों की असीम गहराइयां - यही तो मेरे जीवन का सार है। परंतु पिछले कुछ दिनों से यह कोहरा  मेरे और तुम्हारे बीच  एक अभेद्य दुर्ग बन गया  है। मैं तुम्हें देख नहीं पा रहा, और मेरे अस्तित्व का उद्देश्य ही जैसे खो गया है।"

अंबर  के इन शब्दों से  धरती   व्यथा  से कराह उठी । अपने वक्ष को सहलाते बोली-  “ मेरे ही स्वार्थी पुत्रों ने  महत्त्वाकांक्षा की आग में मेरे ही शरीर को झोंक दिया है। उनके लोभ की अग्नि से उठने वाला वह जहरीला धुआँमेरे और तुम्हारे प्रेम के बीच एक काली दीवार बन गया है। यह कालापन केवल तुम्हें ही नहीं, मुझे भी मेरे ही सौंदर्य से विमुख कर रहा  है।"

दोनों के मौन में एक अव्यक्त पीड़ा थी, एक ऐसा मौन जो हजारों शब्दों पर भारी था। नीलांबर ने पीड़ा से भरे  अश्रुओं की धारा को बादलों के रूप में परिवर्तित कर दिया, जो शुष्क धरती पर बरसने लगे। यह आँसू केवल जल नहीं , बल्कि उनके हृदय की अथाह  पीड़ा का प्रतीक थे। पृथ्वी ने उन बूँदों को अपने अंक में ले  लिया, मानो  वह अपने प्रिय की वेदना को स्वयं में समाहित  कर रही हो।

समाप्त                            

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

नेपाली भाषा में अनुवाद

 

मेरी लघुकथा :अधूरी रोटी 


अधूरी रोटी /सुधा भार्गव 

     मैंने उसकी नन्ही-सी हथेली पर चवन्नी धरी और निश्चिंत  हो गई। लेकिन वह तो सुबकते लगा , "मैं तो भूखा ही रह जाऊँगा।"

    दूसरे दिन मैंने उसकी हथेली पर चार रोटियाँ रख दीं।हताश-सा बोला, "इससे मेरी भूख तो मिट जाएगी पर बाप की भूख का क्या होगा!। उसे शराब की भूख लगी है।"

    शराब के नाम से मेरा क्रोध उमड़ आया। मैं तड़पकर बोली, "कोई एक तो भूखा रहेगा ही।"                                    "मैं भूख बर्दाश्त कर सकता हूँ, उसकी मार नहीं।" वह फिर सुबकने लगा। 

   यंत्रवत मेरे हाथ पर्स की तरफ बढ़ ही गए।

लिंक -https://hamrokathaghar.com/?p=12979



रविवार, 2 फ़रवरी 2025

ई-पत्रिका / लघुकथा विशेषांक

https://sahityaratan.com/e-patrika/issue-2-january-2025/ 


                          साहित्य रत्न मासिक ई-पत्रिका 

जनवरी -2025 ,वर्ष -2 अंक 9 पर दृष्टि   डालते ही मैँ अवाक रह गई। आवरण पत्र इतना सुंदर !  एक ही पत्रिका में  147 लघुकथाएं समा गई है। आलेख भी ज्ञानवर्धक हैं। इसमें अतिथि संपादक श्री बलराम अग्रवाल जी का श्रम पूर्णतया परिलक्षित है। साथ ही राम अवतार बैरवा जी का बहुत बहुत धन्यवाद। यह  पत्रिका अपने में अनूठी है। इसका  भविष्य भी बहुत उज्जवल है। इसमें मेरी भी तीन लघुकथाएं प्रकाशित हुई  हैं --- 1-ईनोफ्रेंडली नगीना,2-माटी की पुकार,3-लोहे का देवता






1-ईनोफ्रेंडली नगीना   

चची का पशुप्रेम आजकल कुछ ज्यादा ही परवान चढ़ रहा था। हमेशा गोबर के ढेर से बातें करती नजर आती। आज तो चची के पास गोबर का  ढेर ही नहीं लगा था ,उसमें से मिट्टी   और चूना भी झांक रहा था।  पास में बैठे दो नवयुवक  उसे ईंटों के साँचे में भरकर   धूप में रख देते। वह हैरानी से  कुछ देर तक तो यह तमाशा देखता रहा । फिर रहा नहीं गया और बोला- 

“अरे चची  अभी तक तो तू गोबर मिट्टी के दीपक और देवी देवताओं की प्रतिमा बनाने में व्यस्त थी। अब  यह क्या नया धंधा शुरू !”

“देख तो किसनू बेटा , कितनी सुंदर  ईनोफ्रेंडली  ईंटें बन रही है!”

“ --- इकोफ्रेंडली की बात कर रही हो क्या ?

“हाँ -हाँ- वही !उफ बार- बार  नाम ही दिमाग से नदारत हो जावे है।“

“लेकिन इनका होगा क्या!”

“लो -यह भी बताना होगा!ईंटों से घर बनेगा घर!”

“तब तो  हवा के एक झोंके से ही तेरे गोबर के महल का धूम धड़ाका जरूर  हो जाएगा।” 

“शुभ- शुभ बोल! घर गिरें दुश्मनों के !  प्रोटीन और फाइवर की जुगलबंदी के कारण गोबर की बनी मजबूत ईंट से  तो  आग भी   डर कर भागेगी।   इंद्र  देवता की भी क्या मजाल! उसे तिरछी नजर से देख सकें। “

“ अच्छा ….तब  तो  गोबर की  मांग बढ़ जाएगी!”  

"हाँ रे। मैं भी यही सोचूँ!जैसे ही गऊ माँ  ने  दूध देना बंद किया, निगोड़े लावारिस की  तरह जंगल में छोड़ देवे हैं।  अब कम से कम उसकी दुर्दशा तो न होगी।जय गैया मैया।”

चची के  दोनों हाथ जुड़ गये। हाथ तो किसनू के   भी  जुड़े पर गऊ माँ के लिए नहीं  बल्कि उसके रक्षक के लिये।


2-माटी की पुकार / सुधा भार्गव 

बेटे ने स्पेस इंजीनियरिंग पास कर ली थी । खुशी से मेरे  पैर जमीन पर ही न पड़ते । घर पर आने से पहले ही मैंने सारे मोहल्ले में मिठाई भी बँटवा  दी ।बेटा उछलता हुआ घर आया और आते ही बिना विराम लगाए अपने मन की बात कह सुनाई । अपना सपना साकार करने के लिए उसने तो अंतरिक्ष उड़ान की ट्रेनिंग भी ले ली थी।इसलिए अंतरिक्ष की सैर करके मंगल ग्रह पर जाना चाहता था।   मुझे तो लकुआ मार  गया। सोचने -समझने की शक्ति धराशाई! सालों बाद  बेटा घर पर आया ! मेरे पास रहने की बजाय अंतरिक्ष में जाने के सपने सँजो रहा है !।एक मिनट को तो लगा ---उसका दिमाग खराब हो गया है । अच्छी -खासी अपनी धरती मां को छोड़कर ऐसे ग्रह पर जाने की अवधारणा  जहां न पानी, न हवा ,न खाने को दाना!

मैंने उसे सच्चाई बतानी चाहिए तो उपदेशों की झड़ी शुरू…. पृथ्वी का मिजाज तो ग्लोबल वार्मिंग के कारण बिगड़ रहा है। कुछ दिनों में तो यह रहने लायक भी नहीं रहेगी। इसलिए उसका विकल्प ढूंढना जरूरी हो गया है।

मैं तो उसका मुंह  देखता रह गया। पराए ग्रह की इतनी फिक्र!अपनी धरती का दोहन करते समय क्या  सारी बुद्धि बेच खाई थी! मंगल  ग्रह को खंगालते -खंगालते बच्चू की जवानी निकल जाएगी--- पल -पल जान जोखिम  अलग !अरे इतना समय और दिमाग  धरती  पर खर्च किया होता  तो जाने की ज़रूरत ही न पड़ती। वसुंधरा शस्य श्यामला बनी रहती। अब उसे समझाए कौन!


3-लोहे का देवता/सुधा भार्गव 

वह बड़ा सा मैदान !जिसमें हरी-भरी घास का गलीचा बिछा  था ,पक्षियों के कलरव से अद्भुत संगीत गूंजता था, कुछ दिन पहले वही  युद्ध का अखाड़ा  बन गया। देखते ही देखते  कर्णभेदी … दिल  दहलाने वाली चीखों  से भर  उठा। 

 दोनों तरफ की सेनाएं  युद्ध स्थल में डटी हुई थी। एक तरफ मशीनी मानव की सेना तो दूसरी तरफ मिट्टी मानव की।  युद्ध की शुरुआत मशीनी मानव के कमांडर से हुई  जो सत्ता के नशे में चूर था। मिट्टी मानव सेना शांतिप्रिय थी लेकिन अपनी रक्षा करने के लिए कटिबद्ध   । मशीनी  सेना बिना रुके, बिना थके ,बिना खाए -पीए,रात -दिन ,मिसाइल्स, बम दाग रही थी। उसके  युद्ध कौशल पर कमांडर ऑफिसर फिदा !खून  की नदियां बह चलीं। चारों तरफ मौत का साया !  मिट्टी  मानव की समझ में नहीं आ रहा था .. क्या दोष है उसका ! इसका जवाब तो मशीनी मानव  पर भी नहीं था ।



शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

छटा अंक लघुकथा कलश अंक 2021

 

संस्मरणात्मक आलेख

(लघुकथा से सम्बंधित संस्मरणात्मक आलेख-लघुकथाकलश का छठा अंक-आलेख विशेषांक/जुलाई-दिसंबर/5जुलाई)

एक नया अध्याय /सुधा भार्गव

जीवन में कभी-कभी ऐसे पल  आते हैं जो इंसान को अप्रत्याशित रूप से बदल कर रख देते हैं। व्यक्तित्व बदल जाता है ,जीवनशैली बदल जाती है और उथल-पुथल मच जाती हैं भावनाओं के समुन्दर में। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ जिससे  मेरे कविता के छोटे से रचना संसार में हलचल पैदा हो गई और लेखनी लघुकथा की और मुड़  गई।         

बात उन दिनों की है जब मेरा बेटा लन्दन रहता था। २००७ में मैं उससे  मिलने लन्दन गई। करीब ३-४  महीने रहना था। एक महीना तो घूमने-घामने, में मस्ती से बीत गया।डायरी लिखने का शौक था सो डायरी पर डायरी भरती गई । पर बाकी का समय खूबसूरती से कैसे बिताया जाय इस पर मनन होने लगा। पोती ने सुझाया -"अम्मा पास ही लाइब्रेरी है। एक कार्ड पर एक माह को दस दस किताबें मिल जाती हैं। मेरा कार्ड है,मम्मी का कार्ड है। दीदी का भी है. मैं कल आपको वहां ले चलूँगी।बैठे -बैठे खूब पढ़ना और घर भी किताबें ले आना ।” मेरी तो बिन कहे ही मनमुराद पूरी हो गई। सच  खुशी से उछल पड़ी। 

दूसरे दिन बड़े उत्साह से होन्सलू हाई स्ट्रीट जा पहुंचे। लाइब्रेरी वहां ट्रीटी सेंटर मॉल के अंदर है। देखकर चकित हो उठी कि  लाइब्रेरी में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी ,बंगला,मराठी,गुजराती और उर्दू साहित्य की भरमार है। विदेश में भी  भारतीय भाषाओँ के प्रेमी!अंग अंग चहक  उठा 

एक ओर हिंदी वरिष्ठ साहित्यकारों की करीने से सजी पुस्तकें मेरा ध्यान आकर्षित करने लगीं। कहानी, कविता, उपन्यास का चुनाव करते -करते बीसवीं सदी की लघुकथाएं श्रृंखला का 'पाप और प्रायश्चित' खंड पर उँगलियाँ टिकी तो टिकी ही रह गईं। अलमारी के आगे खड़े -खड़े पेज पलटते -पलटते दो तीन पढ़ डाली। पढ़ते ही दिमाग में उसकी प्रतिक्रिया होनी शुरू हो गई। मैं तो खो सी गई।सारी किताबें दरकिनार कर वहां बिछे सोफे पर पसर कर उसी को पढ़ने में व्यस्त हो गई। छोटी छोटी कहानियां पर उनका गहरा असर--कभी होंठों पर हँसी थिरकने लगती तो कभी सीने में काँटा सा चुभ जाता। जातक लघु कथाएं पंचतंत्र की छोटी छोटी कहानियां तो पढ़ी थी पर ऐसी लघुकथाएं पढ़ने का मौका पहला ही था ।    

  इस श्रृंखला का संपादन बलराम ने किया है। हास्य के फ्रेम में क्या व्यंग कसा है--मेरी तो स्मृतियों में कैद हो कर रह गया। अवचेतन मन में बसी कोई न कोई लघुकथा जब तब मुखर हो उठती है। 

अब तो लालच बढ़ता ही गया। कहानी कविताओं से गुजरते हाथ लघुकथाओं को थामने  लगे. लघुकथा संकलन ‘पहाड़ का कटहल’भी लाइब्रेरी में मिल गया। नीली फ्रॉक ,चार हाथ,पेट,भूख जैसी अनेक लघुकथाएं हैं जो निर्मम यथार्थ को उजागर करती है। और हमें याद आने लगते हैं विष्णु प्रभाकर के वे शब्द ‘युगों को क्षणों में भोगने की कथा है लघुकथा।’

 

अब तो लघुकथाओं ने मेरा ऐसा मन मोह लिया कि जब भी लाइब्रेरी जाती आँखें लघुकथा संग्रह टटोलतीं। इत्तफाक की बात -वहां बलराम अग्रवाल के लघुकथा संग्रह “जुबैदा”से भी आँखें चार हो गई। उसकी एक लघुकथा मेरा बहुत दिनों तक पेट फुलाती रही। समझ नहीं आ रहा था किसे सुनाऊँ?

एक दिन सुबह मेज पर बैठे हम नाश्ता कर रहे थे।बेटा ऑफिस जाने वाला था। शाम को शायद उसकी कोई मीटिंग थी। गंभीरता का मुखौटा चढ़ाये स्वयं को उसके लिए मन ही मन तैयार कर रहा था।मैं तो उसका मुस्कराता चेहरा देखना चाहती थी --क्या करूँ!अचानक याद आ गई वही जुबैदा में संग्रहित लघुकथा 'नागपूजाजो मेरे दिमाग पर बहुत दिनों से छाई हुई  थी। बस शुरू हो गई। 

एक बात बताऊँ,बड़ी दिलचस्प है। मैंने खामोशी तोड़ी। सब मेरा मुंह ताकने लगे।लघुकथा मुड़ती मुड़ाती यूँ उमड़ पड़ी --

ऑफिस में साहब की एक नई सेक्रेटरी आई। वह क्रिश्चियन थी। पहले ही दिन उस पर खूब झाड़ पड़ी। दूसरे दिन स्कर्ट की जगह सफेद साड़ी लाल बॉर्डर की पहनकर आई। वह बड़ी सुन्दर लग रही थी। साहब उसे देखते ही रह गए। उसने दूध का गिलास उन्हें थमा दिया। वे गटागट पी गए। कब कैसे पी गए उन्हें पता ही न चला। इसी बीच सेक्रेटरी ने मेज पर रोली चावल की डिब्बी रखी।  साड़ी के पल्लू से अपना सर ढका। अनामिका और अंगूठे की सहायता से साहब की और रोली के छीटें उछालती बोली-आज नागपंचमी है। आज के दिन सही प्रोसेस से नाग को पूजते और दूध पिलाते हैं सर !यदि वह दूध को एक्सेप्ट कर लेता है तब पूरा साल उसके द्वारा डसने का डेंजर ख़तम हो जाता

है। "

उसके बाद वह बड़ी सादगी से हाथ जोड़कर खड़ी हो गई और बोली- यू एक्सेप्टेड द मिल्क सर !थैंक यू।  नेक्स्ट ईयर आपकी भरपेट सेवा करेगा हम। ”

बेटे के होठों पर मंद हँसी थिरकने लगी। 

तब तक न मैं इस विधा के बारे मैं कुछ जानती थी और न ही कभी लिखी थी पर मैंने अनुभव किया कि साहित्य की  विधा  लघुकथा जो मेरे लिए नई -नवेली थी सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से खरी उतरी। व्यस्त होते हुए भी लोग उसे सुनने को तैयार और उसके शब्दों की गूँज बहुत समय तक हवा में तैरती रहती हैं।  

लाइब्रेरी में एक संग्रह में कमलेश भारतीय की भी लघुकथाएं पढ़ीं। जब जब किसी के लिए चाय बनाती हूँ कमलेश भारतीय की ‘सर्वोत्तम चाय ;लघुकथा का एक एक शब्दरूपी पत्ता फड़फड़ाने लगता है -'चाय केवल चाय नहीं होती,इसके अलावा भी बहुत कुछ है।' इसमें निहित भावना सदैव के लिए मेरी जीवन संगिनी बन गई।  

भारत जाकर सबसे पहला काम किया -पुरानी डायरी निकालकर उस पर लिख दिया -'जीवन की छोटी -छोटी घटनाएँ ही लघुकथा का रूप धारण कर लेती हैं I' डायरी खोली --देखा ----२-३ लघुकथाएँ तो पूरी की पूरी तैर रही हैं I मुझमें विश्वास पैदा हुआ -मैं लघुकथा लिख सकती हूँ। लन्दन जाना क्या हुआ चंद घंटों में मेरी लेखनयात्रा में एक नया अध्याय ही जुड़ गया जो वर्षों भारत में रहकर न हो सका।जब कभी फुरसत के पलों में अतीत के इन पन्नों को खंगालती हूँ तो स्वयं अभिभूत हो उठती हूँ।

5/7/2020

सुधा भार्गव 

जे ब्लॉक ,703 स्प्रिंगफील्ड एपार्टमेंट 

सरजापुरा रोड 

बैंगलोर -560102 

मो.9731552847